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बाज़ार के सहभागी

बाज़ार के सहभागी
निवेशक इस उम्मीद में कंपनी के शेयरों के मालिक होंगे कि शेयर मूल्य में वृद्धि होगी या वे लाभांश भुगतान या दोनों प्राप्त करेंगे। स्टॉक एक्सचेंज इस पूंजी जुटाने की प्रक्रिया के लिए एक सूत्रधार के रूप में कार्य करता है और कंपनी और उसके बाज़ार के सहभागी वित्तीय भागीदारों से अपनी सेवाओं के लिए शुल्क प्राप्त करता है।

चार सप्ताह तक शनिवार-रविवार बंद रहेगा पाटन बाजार

चार सप्ताह तक पाटन बाजार शनिवार और रविवार को अब पूरी तरह से बंद रहेगा। कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए यह निर्णय पाटन के व्यापारियों ने खुद लिया है। व्यापारियों ने इस संबंध में गत दिवस एक बैठक आहूत की। जिसमें सर्वसम्मति से चार सप्ताह तक शनिवार और रविवार को स्वेच्छता से बाजार बंद रखने का निर्णय लिया गया। व्यापा

चार सप्ताह तक शनिवार-रविवार बंद रहेगा पाटन बाजार

जबलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

चार सप्ताह तक पाटन बाजार शनिवार और रविवार को अब पूरी तरह से बंद रहेगा। कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए यह निर्णय पाटन के व्यापारियों ने खुद लिया है। व्यापारियों ने इस संबंध में गत दिवस एक बैठक आहूत की। जिसमें सर्वसम्मति से चार सप्ताह तक शनिवार और रविवार को स्वेच्छता से बाजार बंद रखने का निर्णय लिया गया। व्यापारी संघ ने तहसील प्रशासन को भी इससे अवगत कराते हुए पत्र सौंप दिया बाज़ार के सहभागी है।

‘घोड़ा बाजार क्यों,… बकरा बाज़ार कहिए,ज़नाब’

देश का लोकतंत्र एक बार पुनः खतरे में आ गया।उसकी हत्या की जा रही है।…मानना पड़ेगा,बहुत ही बेशर्म है,हमारा तथाकथित लोकतंत्र बार-बार खतरे में आता है।हत्या की साज़िशें होती हैं,लेकिन,यह नामुराद न तो मरता है,और ना ही सुधरता है!!लगता है,पौराणिक मान्यताओं के पात्र ‘राहु-केतु’ की भांति यह भी अमृत्व पान कर चुका है।देश के तमाम राजनीतिक दलों के बहुआयामी प्रयासों के बाद भी,लोकतंत्र मृत नहीं हुआ।आज भी वो खतरे में है,लेकिन पूरा-पूरा विश्वास है,कि वह जल्द ही स्वस्थ होकर,खतरे से बाहर आ जायेगा।प्रतिवर्ष दशहरा मनाते हुए,हम ‘रावण’ का पुतला जलाते हैं,और आश्चर्यजनक रूप से वह अगले वर्ष पहले कहीं और मज़बूत कद काठी के साथ फिर से आ जाता है।लोकतंत्र और रावण के पुतले में अंतर मात्र इतना है,कि रावण का वध भगवान ‘श्रीराम’ ने मानव जीवन के उद्धार के लिए किया था।ताकि,असुर प्रवृत्ति के लोगों से मनुष्यों की रक्षा की जा सके।वहीं लोकतंत्र की स्थापना जनता के उद्धार के लिए की गई थी।मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए की गई थी।लेकिन,उसकी हत्या वही लोग कर रहे हैं,जिन्होंने हमेशा लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुहाई दी है।कोई भी राजनीतिक दल दूध का धुला नहीं है।जब जिसको जैसा मौका मिला,उसने लोकतंत्र का दोहन किया।जो मौका चूक गया,वो लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाता रह गया।यही परम्परा है,भारतीय राजनीति की।महराष्ट्र में मचे सत्ता के घमासान ने यह साबित कर दिया,कि लोकतंत्र की हत्या में सभी राजनीतिक दल सहभागी हैं।लोकतंत्र की हत्या तो उसी दिन हो गई थी,जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटा था।एनसीपी-काँग्रेस मतदाताओं के फैसले को सर आँखों पर लेने का नाटक करते हुए,विपक्ष में बैठने की भूमिका निभाने की बात करते रहे।अचानक,हृदय परिवर्तन हुआ,और सत्ता पर काबिज़ होने की लालसा में,धुरविरोधी तीनों दल एक साथ आने के लिये प्रयासरत हो गए।व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते सत्ता की सौदेबाजी में देर हुई।यही देर एनसीपी में अजित पवार के विद्रोह का कारण बनी।इसका भरपूर फ़ायदा भाजपा ने उठाया।कुल,मिलाकर अपराधी तो सभी हैं,लोकतंत्र की हत्या के।इन चारों दलों ने महाराष्ट्र की जनता और वहाँ के मतदाताओं के साथ छल किया है।यदि,इन दलों और उनके नेताओं को लोकतंत्र बचाने की,या जनता की भावनाओं की इतनी फ़िक्र थी,तो सही हल तो यही होता कि,इन चारों दलों को सरकार बनाने के दावे की बजाय,पुनः चुनाव करवाने की माँग करनी चाहिए थी।जिस देश में इन राजनीतिक दलों पर हजारों-लाखों करोड़ के घोटलों के आरोप लगते रहते हैं।साबित भी होते हैं।ऐसे में पुनः चुनाव करवा कर जनता पर आर्थिक बोझ न डालने की बात कहना हास्यप्रद लगती है।हक़ीक़त यह है,कि ये चारों राजनीतिक दल इस बात से भयभीत हैं,कि इनकी राजनीतिक उठा-पटक से आम जनता नाराज़ है।उनका परम्परागत मतदाता भी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।इसलिए,हर कोई पुनः चुनाव से बचना चाहता है।जबकि,इनके मन में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति रँचमात्र भी चिंता होती,तो ये पार्टियाँ महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का स्वागत करती,न कि पिछले दरवाजे सत्ता पर काबिज़ होने का प्रयास करती।अपनी पार्टी के चुने गए प्रत्याशियों को बलि का बकरा बनाना,और तुलना घोड़े से करना,कहाँ तक उचित है?हॉर्स ट्रेडिंग की बात करना,या अस्तबल उठाकर ले जाना,ये कौन सी गरिमामय अभिव्यक्ति है,जनता के द्वारा चुने गए,जनप्रतिनिधियों के लिए?सत्ता सब को चाहिए,लेकिन किन शर्तों पर,…किन सिद्धांतों पर,…कोई तो मापदण्ड हो. आख़िर कब तक जनता के साथ दुराचार होता रहेगा?

भारत को 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में मददगार होगा आम बजट: USISPF

भारतीय अर्थव्यवस्था

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा सोमवार को पेश किए गए आम बजट 2021-22 की तारीफ करते हुए अमेरिका-भारत रणनीतिक एवं साझेदारी मंच (USISPF) ने इसे साहसिक और दूरदर्शी बताया, जो अर्थव्यवस्था को एक वृद्धि के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाएगा।

5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक
यूएसआईएसपीएफ के अध्यक्ष मुकेश अघी ने कहा कि, 'हम भारत के बजट की सराहना करते हैं। यह अर्थव्यवस्था को वृद्धि के रास्ते पर ले जाने वाला और साहसिक कदम है। बजट भारत को 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक है।' उन्होंने कहा कि बजट में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे कृषि, बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रक्षा में सरकारी खर्च बढ़ा है।

शेयर मार्केट क्या है ?और यह कैसे काम करता है ?

शेयर मार्केट शब्द कई लेन-देन को संदर्भित करता है जिसमें सार्वजनिक रूप से आयोजित कंपनियों के शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं। इस तरह की वित्तीय गतिविधियां औपचारिक लेन-देन और ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) मार्केटप्लेस के माध्यम से आयोजित की जाती हैं जो नियमों के परिभाषित सेट के तहत संचालित होती हैं।

"स्टॉक मार्केट" और "शेयर मार्केट " दोनों का अक्सर एक दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है। शेयर बाजार के व्यापारी एक या अधिक स्टॉक एक्सचेंजों पर शेयर खरीदते या बेचते हैं जो समग्र शेयर बाजार का हिस्सा हैं।

शेयर बाजार को समझे -

शेयर बाजार प्रतिभूतियों के खरीदारों और विक्रेताओं को मिलने, बातचीत करने और लेन-देन करने की अनुमति देता है। बाजार निगमों के शेयरों के लिए मूल्य खोज की अनुमति देते हैं और समग्र अर्थव्यवस्था के लिए बैरोमीटर के रूप में काम करते हैं। खरीदारों और विक्रेताओं को उचित मूल्य, उच्च स्तर की तरलता और पारदर्शिता का आश्वासन दिया जाता है क्योंकि बाजार सहभागी खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा करते हैं।

पहला शेयर बाजार लंदन स्टॉक एक्सचेंज था, जो एक कॉफी हाउस में शुरू हुआ था, जहां 1773 में व्यापारी शेयरों का आदान-प्रदान करने के लिए मिलते थे।

बटनवुड समझौता, इसलिए नाम दिया गया क्योंकि यह एक बटनवुड पेड़ के नीचे हस्ताक्षर किया गया था, 1792 में न्यूयॉर्क की वॉल स्ट्रीट की शुरुआत को चिह्नित किया गया था। इस समझौते पर 24 व्यापारियों ने हस्ताक्षर किए थे और यह प्रतिभूतियों में व्यापार करने वाला अपनी तरह का पहला अमेरिकी संगठन था। व्यापारियों ने 1817 में अपने उद्यम का नाम बदलकर न्यूयॉर्क स्टॉक एंड एक्सचेंज बोर्ड कर दिया।

शेयर बाजार कैसे काम करता है ?

शेयर बाजार एक सुरक्षित और विनियमित वातावरण प्रदान करते हैं जहां बाजार प्रतिभागी शून्य से कम परिचालन जोखिम के साथ विश्वास के साथ शेयरों और अन्य योग्य वित्तीय साधनों में लेनदेन कर सकते हैं। नियामक द्वारा बताए गए परिभाषित नियमों के तहत काम करते हुए, शेयर बाजार प्राथमिक बाजारों और द्वितीयक बाजारों के रूप में कार्य करते हैं।

एक प्राथमिक बाजार के रूप में, शेयर बाजार कंपनियों को आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) की प्रक्रिया के माध्यम से पहली बार जनता को अपने शेयर जारी करने और बेचने की अनुमति देता है। यह गतिविधि कंपनियों को निवेशकों से आवश्यक पूंजी जुटाने में मदद करती है।

एक कंपनी खुद को कई शेयरों में विभाजित करती है और उनमें से कुछ शेयरों को प्रति शेयर मूल्य पर जनता को बेचती है।इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए, एक कंपनी को एक बाज़ार की आवश्यकता होती है जहाँ इन शेयरों को बेचा जा सकता है और इसे शेयर बाजार द्वारा प्राप्त किया जाता है। एक सूचीबद्ध कंपनी बाद के चरण में अन्य पेशकशों के माध्यम से नए, अतिरिक्त शेयरों की पेशकश कर सकती है, जैसे राइट्स इश्यू या फॉलो-ऑन प्रसाद के माध्यम से। वे अपने शेयरों की पुनर्खरीद भी कर सकते हैं या उन्हें असूचीबद्ध भी कर सकते हैं।

जागरुकता से ढही अंधविश्वास की दीवार, 55 साल बाद सजा बाजार

55 साल बाद सजा बाजार

शेख तैय्यब ताहिर/जगदलपुर. जागरूकता से अंधविश्वास की दीवारें भी ढह जाती हैँ। एेसा ही कुछ वाकया नगरनार स्टील प्लांट से सटे कस्तूरी में देखने को मिला। करीब 55 सालों के बाद यहां साप्ताहिक बाजार की शुरूआत हुई। दरअसल सन1963 में यहां बाजार बाज़ार के सहभागी बाज़ार के सहभागी की शुरुआत हुई थी। इसी दौरान गांव के आठ लोगों की असामयिक मौत हो गई। इस घटना से लोगों में यह अंधविश्वास घर कर गया कि यह सब बाजार भरने के चलते हुआ।

60 से अधिक स्टॉलों के साथ यहां हजारों की भीड
सोमवार की सुबह से बाज़ार के सहभागी ही गांव में उत्सव का सा नजारा था। बाजार स्थल पर 60 से अधिक स्टॉलों के साथ यहां हजारों की भीड़ बाजार का हिस्सा बनने पहुंची उमड़ी थी। इसका श्रेय इस इलाके में तीन दशक से लगातार खुलने वाली शिक्षण संस्थानों को जाता है। इन दर्जन भर शिक्षण संस्थानों से निकली नई पीढ़ी ने अंधविश्वास को परे कर एक नवाचार की शुरुआत कर डाली।

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